क्या है क्लाउड सीडिंग
CLOUD SEEDING
हाल ही में राजधानी दिल्ली में सेसना एयरक्राफ्ट का उपयोग कर क्लाउड सीडिंग (Cloud seeding) की प्रक्रिया के द्वारा कृत्रिम बारिश (Artificial rain ) कराने के प्रयास किए गए | ये प्रयास आईआईटी कानपुर की निगरानी में किए गए |
क्या है प्रक्रिया (Process) :
1. सर्वप्रथम राडार और सेटेलाइट की मदद से बादल ढूंढे जाते हैं | एक उड़ते हुए एयरक्राफ्ट से वायुमंडल में सिल्वर आयोडाइड एवं अन्य रसायनों का छिड़काव किया जाता है। इसमें बहुत थोड़ी मात्रा में विस्फोटक का इस्तेमाल भी किया जाता है। फ्लेयर (विमान) से बादल के आसपास का तापमान बढ़ता है और गर्मी की वजह से हवा ऊपर उठने लगती है|
2. छोड़े गए यह रसायन बादलों के साथ रिएक्ट कर क्रिस्टल में बदलते हैं और पानी की बूंद से चिपक कर बड़ी बूंदे बनाते हैं । यदि बादल ठंडा हैं तो बर्फ की बूंदे बनाई जाती हैं और यदि गर्म है तो नमक उनकी नमी को सोखता है|
3. जब पानी की बूंदे बड़ी हो जाती है तो बारिश होने लगती है |
कौन से रसायन काम में लिए जाते हैं (Chemicals Used) :
मुख्य रूप से इसमें सिल्वर आयोडाइड (silver iodide) का इस्तेमाल होता है | साथ ही सोडियम क्लोराइड (नमक NaCl), कैल्शियम क्लोराइड (CaCl₂), कैल्शियम कार्बाइड (CaC₂), कैल्शियम ऑक्साइड(CaO), dry ice (Solid CO₂) और यूरिया के साथ अमोनियम नाइट्रेट (NH₄NO₃) का भी इस्तेमाल होता है|
क्या है उपयुक्त स्थिति (Favourable Conditions) :
इसके लिए उपयुक्त स्थिति यह है कि प्राकृतिक बादल 40% से अधिक हों , जिनकी ऊंचाई 5000 मीटर से कम हो ,साथ ही नमी का स्तर भी 40% से 50% तक हो| यदि बादलों में नमी नहीं है ,उनकी ऊंचाई अधिक है और मौसम शुष्क नहीं है तो बारिश की संभावनाऐं कम हो जाती हैं |
हालांकि यह एक महंगी प्रक्रिया है और इसका असर सीमित समय और सीमित इलाके में ही होता है |
क्लाउड सीडिंग से कृत्रिम बारिश करवा कर स्मोग (smog) से कुछ समय के लिए तो राहत मिल सकती है लेकिन यह स्थाई समाधान नहीं है |
लाभ (Advantages) :
1. इससे वायु प्रदूषण को कम करने में मदद मिल सकती है |
2. इससे सूखा प्रभावित या कम वर्षा वाले क्षेत्रों में कृत्रिम वर्षा कराई जा सकती है |
3. जल भंडारों (water reservoirs) को भरा जा सकता है |
4. कृषि ,पेयजल और बिजली उत्पादन में मदद मिल सकती है |
कमियाँ (Disadvantages) :
विशेषज्ञ इस प्रक्रिया के को लेकर बहुत उत्साहित नहीं है क्योंकि :
1. यह एक बहुत महंगी प्रक्रिया है |
2. सर्दियों में इसके नतीजे अस्पष्ट हैं|
3. कम बारिश में स्मोग (smog) से राहत मिलने की संभावना काफी कम है |
4. कृत्रिम बारिश के लिए प्राकृतिक बादलों का होना बहुत जरूरी है इनके बिना बारिश नहीं हो सकती है |
5. कृत्रिम बारिश से प्रदूषक तत्व नीचे तो आ सकते हैं किंतु इसका प्रभाव सीमित क्षेत्र में ही रहता है | वह भी थोड़े समय के लिए ही | यह हो सकता है की कृत्रिम बारिश के प्रयास जिस स्थान पर किए जाएं वहां बारिश न होकर किसी दूसरे स्थान पर हो (हवा की वजह से) |
6. यह एक स्थाई समाधान नहीं है| एयर क्वालिटी को ठीक करने के लिए प्रदूषण के स्रोत पर काम करने की आवश्यकता अधिक है| जैसे- ट्रांसपोर्ट, पावर कचरा (power waste ), कंस्ट्रक्शन से होने वाला प्रदूषण (pollution caused by construction) आदि |
पर्यावरण पर असर :
रिसर्च के मुताबिक यदि तय मात्रा में सिल्वर आयोडाइड का इस्तेमाल किया जाए तो यह पर्यावरण ,जीव जंतु तथा मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा नहीं है | लेकिन यदि इसका इस्तेमाल बार-बार और अधिक मात्रा में किया जाएगा तो इससे जमीन में केमिकल्स की मात्रा बढ़ जाएगी जिससे पेड़ पौधों और पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंच सकता है|
यदि विजिबिलिटी कम हो, बादलों में जरूरत से अधिक नमी हो और प्राकृतिक बारिश हो रही हो या मानसून का दौरा चल रहा हो तो उस समय क्लाउड सीडिंग करने पर वह नुकसानदायक साबित हो सकती है|
ऐसा नहीं है कि दिल्ली में कृत्रिम बारिश पहली बार करवाई जा रही है सन 1957 ,1971 में इसका ट्रायल पहले हो चुका है | महाराष्ट्र और राजस्थान में भी इस तरीके के प्रयास पहले किया जा चुके हैं |
क्लाउड सीडिंग,स्मोग टावर (smog tower), एंटी स्मॉग गन (anti smog gun) जैसे प्रयास कुछ समय के लिए विजिबिलिटी (visibility) के फायदे दे सकते हैं लेकिन इन्हें सस्टेनेबल सॉल्यूशन (sustainable solution ) नहीं कहा जा सकता |