-शॉक थेरेपी (SHOCK THERAPY)-
सोवियत संघ के विघटन का एक बड़ा परिणाम शॉक थेरेपी के रूप में सामने आया । शॉक थेरेपी का अर्थ है 'सदमा पहुंचा कर रोगी का इलाज करना' ।जिस प्रकार किसी दुर्लभ मानसिक रोग के इलाज हेतु रोगी को सदमा (shock) पहुंचा कर ठीक करने (therapy)का प्रयास किया जाता है उसी प्रकार सोवियत संघ (जो कि एक रोगी की भांति कमजोर अवस्था में था), के पतन के पश्चात वहां की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी |इसे ठीक करने के उद्देश्य से विश्व बैंक ( WORLD BANK) व अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा उसमें काफी व्यापक परिवर्तन किए गए। इसमें समाजवादी अर्थव्यवस्था को छोड़कर पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को अपनाने के प्रयास शामिल थे। किंतु इस सब में रूस को भारी उथल-पुथल का सामना करना पड़ा (ठीक उसी प्रकार जैसे मानसिक रोगी शॉक थेरेपी लेते समय बहुत ही कठिन परिस्थिति में आ जाता है)। इसीलिए इन प्रयासों को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शॉक थेरेपी नाम दिया गया ।
शॉक थेरेपी के परिणाम:
1. राज्य की संपत्ति का निजीकरण किया गया अर्थात सरकारी संपत्ति को लोगों को बेचा जाने लगा।
2. सामूहिक कृषि फर्मों को निजी फर्मों में बदला जाने लगा ।
3. मुक्त व्यापार व्यवस्था को अपनाया गया ।
4. रूसी अर्थव्यवस्था को पश्चिमी देशों की आर्थिक व्यवस्था से जोड़ा गया ।
5. वहां के 90% उद्योगों को सरकारी क्षेत्र से निजी क्षेत्रों या कंपनियों को बहुत ही सस्ते दामों पर बेचा गया जिसे इतिहास की सबसे बड़ी गराज सेल कहा गया
6. रूस का औद्योगिक ढाँचा चरमरा गया ।वहां की मुद्रा 'रूबल' में काफी गिरावट आई ।
7. पहले सोवियत संघ में वहां के लोगों को काम का अधिकार, बुढ़ापे और बीमारी की स्थिति में सरकारी सहायता प्राप्त करने का अधिकार ,निशुल्क चिकित्सा आदि सुविधाएं प्राप्त थीं किंतु अब वहां समाजवाद की जगह पूंजीवादी व्यवस्था लागू कर दी गई जिससे यह सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना अब राज्य की जिम्मेदारी नहीं रही ।फलस्वरुप वहां लोगों की स्थिति बदतर हो गई और गरीबी बढ़ गई ।
8. रूस में लोगों को कंपनियां चलाने का अनुभव नहीं था। उनके पास प्रबंधकीय कौशल (managerial skills) का अभाव था। इसका परिणाम यह हुआ कि वहां मुद्रास्फीति बहुत ज्यादा बढ़ गई और वहां की मुद्रा रूबल का मूल्य काफी गिर गया ।
9. खेतों और उद्योगों के निजीकरण से रूस में आर्थिक क्षमताएं बहुत बढ़ गईं क्योंकि जब सरकारी संपत्तियों को निजी क्षेत्र को बेचा जा रहा था तो उन्हें अमीर वर्ग ने ही खरीदा जो पहले से ही अच्छी स्थिति में था। फल स्वरुप वहां इस नई व्यवस्था ने अमीर और गरीब के बीच की खाई को और गहरा कर दिया ।
10. सोवियत संघ के विघटन के पश्चात जितने भी नए देश बने थे उन सब के संविधान बहुत ही जल्दबाजी और हड़बड़ी में बनाए गए थे। इनमें लोगों द्वारा चुनी गई संसदों के मुकाबले राष्ट्रपति को ज्यादा शक्तियां प्राप्त थी जिससे वहां राष्ट्रपति सत्तावादी होने लगे।
स्पष्ट है शॉक थेरेपी के परिणाम रूस के अनुकूल नहीं रहे बल्कि उन्होंने रूसी अर्थव्यवस्था को काफी पीछे की ओर धकेल दिया ।