सत्ता के वैकल्पिक केंद्र -I

-यूरोपीय संघ (EUROPEAN UNION)-

जब सोवियत संघ (USSR) का विघटन हो गया और शीत युद्ध समाप्त हो गया तब  राजनीतिक और आर्थिक विकास के लिए नए क्षेत्रीय केंद्र उभर कर सामने आने लगे जिन्होंने कुछ हद तक अमेरिका के वर्चस्व को कम करने का प्रयास किया और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था (multipolar world) की नई अवधारणा को आगे बढ़ाया। इनमें यूरोपीय संघ (EUROPEAN UNION) और आसियान (ASEAN) जैसे क्षेत्रीय संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इन क्षेत्रीय संगठनों ने स्थानीय स्तर पर ही अपनी समस्याओं का समाधान ढूंढने का प्रयास किया ताकि शांति की स्थापना हो सके। आईए इस लेख में हम यूरोपीय संघ के बारे में चर्चा कर लेते हैं :

यूरोपीय संघ (EU) एक क्षेत्रीय संगठन है |

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क्षेत्रीय संगठन आकार में छोटे होते हैं । ये आपसी सहयोग को बढ़ावा देते हैं ,एक दूसरे की आर्थिक सामाजिक आदि गतिविधियों में मदद करते हैं , अपने विवाद को आपसी बातचीत से निपटने में विश्वास करते हैं जिससे इन देशों में एकता की भावना जल्दी ही मजबूत हो जाती है ।



यूरोपीय संघ (EUROPEAN UNION) :

यूरोपीय संघ कोई अचानक जन्म लेने वाला संगठन नहीं है बल्कि इसका अपना एक इतिहास रहा है। जिस रूप में आज हम यूरोपीय संघ को देखते हैं उसके विकास की अपनी एक यात्रा रही है| इसलिए इसे हम शुरुआत से समझने का प्रयास करते हैं ।

द्वितीय विश्व युद्ध से जन्मी परेशानियों का सामना सबसे ज्यादा यूरोप के देशों को ही करना पड़ा क्योंकि ज्यादातर यहीं के देश इसमें शामिल थे ।इससे यहां के देशों की आर्थिक स्थिति काफी खराब हो गई और ऐसे में इन सब देशों को यह बात समझ में आई कि आपसी शत्रुता का यह वातावरण किसी भी प्रकार से उनके लिए ठीक नहीं है। इसलिए इन सबको आपस में बेहतर संबंध बनाने की बहुत ज्यादा जरूरत है ।

आप सभी जानते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के समाप्त होने के साथ ही शीत युद्ध (COLD WAR) भी शुरू हो गया था जिसने अमेरिका व सोवियत संघ में गुटबाजी को बढ़ावा दिया था ।अब क्योंकि यूरोप की पूर्वी सीमा सोवियत संघ से लगती है और सोवियत संघ अपना प्रभाव यूरोप में बढ़ाना चाहता था जबकि अमेरिका उसके प्रभाव को रोकना चाहता था। इसलिए उसने यूरोपीय देशों की सहायता के लिए प्रयास करना शुरू किया। अमेरिका का पहला प्रयास 1947 में मार्शल योजना के नाम से सामने आया। जॉन सी मार्शल उस समय अमेरिका के विदेश मंत्री थे ।मार्शल योजना का उद्देश्य यूरोप के उन देशों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाना था जो द्वितीय विश्व युद्ध में क्षतिग्रस्त हो गए थे। अतः इस योजना के तहत अमेरिका ने यूरोप के देशों की आर्थिक मदद की।

1948 में यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना की गई जिसका उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप के पुनर्निर्माण के लिए मार्शल योजना के अंतर्गत आर्थिक मदद पहुंचाना था| इस मंच के माध्यम से पश्चिमी यूरोप के देशों में व्यापारिक और आर्थिक सहयोग का नया दौर शुरू हुआ तथा आगे के वर्षों में विभिन्न यूरोपीय देशों में संधियों के माध्यम से यूरोप में विभिन्न संगठनों का निर्माण होने लगा जिसकी परिणति हम यूरोपीय संघ के रूप में देखते हैं।

1951 में पेरिस संधि के तहत 6 देशों ने (फ्रांस ,पश्चिमी जर्मनी, इटली ,नीदरलैंड ,बेल्जियम, लक्जमबर्ग )यूरोपीय कोयला और इस्पात समुदाय का गठन किया ।

1957 में रोम संधि द्वारा इन्हीं 6 देशों ने यूरोपीय आर्थिक समुदाय तथा यूरोपीय परमाणु ऊर्जा समुदाय का गठन किया ।

1979 में यूरोपीय संसद की स्थापना की गई और इसके लिए चुनाव करवाया गया |

1985 में शेंगेन संधि द्वारा यूरोपीय समुदाय के देशों के बीच सीमा नियंत्रण को समाप्त कर दिया अर्थात ये सभी देश एक दूसरे की सीमा में बिना वीजा के आ जा सकते थे ।

1992 में  मासट्रिच संधि द्वारा यूरोपीय संघ का निर्माण किया गया जिससे यूरोपीय आर्थिक समुदाय का नाम बदल गया और वह यूरोपीय संघ (EU) बन गया ।

यूरोपीय संघ की अपनी एक मुद्रा है जो 'यूरो' (EURO) कहलाती है ।

इसका अपना एक झंडा है जिसमें सोने जैसे रंग के 12 सितारे हैं जो एकता और संपूर्णता के प्रतीक हैं।

यूरोपीय संघ अपने विभिन्न अंगों और संस्थाओं के माध्यम से काम करता है ।इसके अंग हैं - सुरक्षा परिषद, यूरोपीय संसद ,यूरोपीय मंत्रीपरिषद ,सामाजिक और आर्थिक समिति ,यूरोपीय न्यायालय ।

यूरोपीय संघ के उद्देश्य :

1.सदस्य देशों का आर्थिक एकीकरण अर्थात वस्तुओं, व्यक्तियों, पूंजी तथा श्रम का एक देश से दूसरे देश में आवागमन ।

2.सदस्य देशों की कृषि व्यवस्था में सुधार लाना और उद्योग धंधों का विकास करना ।

3.सभी देशों में शांति स्थापित करना ।

4.सभी देशों की एक  साझी विदेश नीति और सुरक्षा नीति बनाना ।

5.गरीब और अमीर देशों के बीच की खाई को कम करना ।

6.वन ,वन्य जीव और पर्यावरण की सुरक्षा करना ।

यूरोपीय संघ एक प्रभावी क्षेत्रीय संगठन के रूप में उभरा है इसके कई कारण है :

1. यह सबसे पुराना क्षेत्रीय संगठन है जिसकी जड़ें सन् 1948 तक खोजी जा सकती हैं और तब से अब तक यह प्रभावी रूप में बना हुआ है।

2. यूरोपीय संघ ने आपसी आर्थिक सहयोग के साथ-साथ राजनीतिक, वैदेशिक और सुरक्षा के मामले में भी एकता की मिसाल दी है। जैसे इनका अपना एक झंडा, गान ,स्थापना दिवस और अपनी साझी मुद्रा है ।

3. यूरोपीय संघ की नीति सहयोग और मेल मिलाप की रही है। इन्होंने नए सदस्यों को शामिल करके भी अपने प्रभाव का क्षेत्र बढ़ाया है।

4. यूरोपीय संघ की एकता के कारण वह अमेरिका को भी प्रभावित करने की क्षमता रखता है क्योंकि इसमें विश्व के प्रमुख विकसित और विकासशील देश शामिल है। इसमें संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में शामिल स्थाई सदस्य ब्रिटेन और फ्रांस शामिल है। 

5.  यूरोपीय संघ जीडीपी के मामले में दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है ।सन 2025 में इसकी जीडीपी 20 ट्रिलियन डॉलर मापी गई जो की विश्व अर्थव्यवस्था का करीब 17 % है।

6. विश्व व्यापार में भी यूरोपीय संघ के हिस्सेदारी अमेरिका से काफी अधिक है ।

7.  यूरोपीय संघ के पास विश्व की दूसरी सबसे बड़ी सेना है और इसका रक्षा बजट भी अमेरिका के बाद सबसे अधिक है।

इन सब प्रभावी बिंदुओं के होने के बावजूद यूरोपीय संघ में कई खामियां हैं :

1.यूरोपीय मुद्रा यूरो को सभी देशों ने अभी तक नहीं अपनाया है।

2.यूरोपीय संघ से एक प्रमुख देश ब्रिटेन उससे अलग हो गया है।

 3.यूरोपीय संघ का अपना एक साझा संविधान अभी तक नहीं बन पाया है ।

4.कुछ देश अभी भी स्वतंत्र रूप से व्यवहार करते हैं जबकि उनकी एक साझी सुरक्षा और विदेश नीति मौजूद है।

हालाँकि इन खामियों के बावजूद यूरोपीय संघ ने एक प्रभावी वैकल्पिक केंद्र के रूप में पहचान बनाई है | 


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